श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.293.13 
वरं वृणीष्वाश्वपते मद्रराज यदीप्सितम्।
न प्रमादश्च धर्मेषु कर्तव्यस्ते कथञ्चन॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मद्रराज अश्वपात! जो वर तुम्हें चाहिए, वही मांगो। धर्मपालन में कभी प्रमाद न करो॥13॥
 
Madraraj Ashwapata! Ask for the boon that you desire. You should never be negligent in following the dharma.॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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