श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 293: राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.293.1 
युधिष्ठिर उवाच
नात्मानमनुशोचामि नेमान् भ्रातॄन् महामुने।
हरणं चापि राज्यस्य यथेमां द्रुपदात्मजाम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, 'हे महामुनि! जिस प्रकार मैं द्रुपद की पुत्री के लिए शोक कर रहा हूँ, वैसा शोक मैं न तो अपने लिए कर रहा हूँ, न इन भाइयों के लिए और न ही राज्य छिन जाने के लिए।'
 
Yudhishthira said, 'O great sage! The way I grieve for the daughter of Drupada, I do not grieve for myself, nor for these brothers, nor for losing the kingdom.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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