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mahabharat 3.291.7: उन्होंने काकुत्स्थकुलभूषण महात्मा श्री रामचन्द्रजी से नम्रतापूर्वक कहा- 'महात्मन्! अच्छे आचरण से सुशोभित जनक, युवा रानी सीता को स्वीकार करते हैं। 7॥   |   mahabharat अध्याय 3.291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.291.7 
उवाच च महात्मानं काकुत्स्थं दैन्यमास्थित:।
प्रतीच्छ देवीं सद्‍वृत्तां महात्मञ्जानकीमिति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने काकुत्स्थकुलभूषण महात्मा श्री रामचन्द्रजी से नम्रतापूर्वक कहा- 'महात्मन्! अच्छे आचरण से सुशोभित जनक, युवा रानी सीता को स्वीकार करते हैं। 7॥
 
He humbly said to Kakutsthakulbhushan Mahatma Shri Ramchandraji - 'Mahatman! Janak, adorned with good conduct, accept the young Queen Sita. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)