श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  3.291.45-46h 
दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृता: सदा॥ ४५॥
उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन।
 
 
अनुवाद
पिंगलनयन हनुमान! मेरी कृपा से तुम्हें सदैव दिव्य सुख प्राप्त होंगे। 45 1/2॥
 
Pingalanayan Hanuman! By my grace you will always receive divine pleasures. 45 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)