श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  3.291.38-39h 
मार्कण्डेय उवाच
तमुवाच पिता भूय: प्रहृष्टो भरतर्षभ।
गच्छायोध्यां प्रशाधीति रामं रक्तान्तलोचनम्॥ ३८॥
सम्पूर्णानीह वर्षाणि चतुर्दश महाद्युते।
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तत्पश्चात पिता दशरथ अत्यन्त प्रसन्न हुए और कुछ लाल नेत्रों से श्री रामचन्द्रजी से बोले- 'महाद्युते! तुम्हारे वनवास के चौदह वर्ष पूरे हो गए हैं। अब तुम अयोध्या जाकर वहाँ का शासन अपने हाथ में ले लो।' 38 1/2॥
 
Markandeyaji says- Bharatshreshtha Yudhishthir! Thereafter, father Dasharatha became very happy and said to Shri Ramchandraji with somewhat red eyes - 'Mahadyute! Fourteen years of your exile have been completed. Now you go to Ayodhya and take the rule there in your hands. 38 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)