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mahabharat 3.291.25: "वीर! यदि मैंने स्वप्न में भी आपके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का चिन्तन नहीं किया है, तो आप ही देवताओं द्वारा मुझे दिए गए एकमात्र पति हैं।" ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 3.291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.291.25 
यथाहं त्वदृते वीर नान्यं स्वप्नेऽप्यचिन्तयम्।
तथा मे देवनिर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव॥ २५॥
 
 
अनुवाद
"वीर! यदि मैंने स्वप्न में भी आपके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का चिन्तन नहीं किया है, तो आप ही देवताओं द्वारा मुझे दिए गए एकमात्र पति हैं।" ॥25॥
 
"Valiant! If I have never thought of any man other than you even in my dreams, then you are the only husband given to me by the gods." ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)