श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.291.13 
सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि।
नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मिथिलेशानंदिनी! तुम्हारा आचरण और विचार शुद्ध रहे हों या अशुद्ध, अब मैं तुम्हें अपने प्रयोजनों के लिए उपयोग नहीं कर सकता - जैसे कुत्ते का चाटा हुआ भोजन कोई ग्रहण नहीं करता।॥13॥
 
Mithileshanandini! Whether your conduct and thoughts have remained pure or impure, I cannot use you for my purposes now - just like no one accepts food that has been licked by a dog.'॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)