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mahabharat 3.291.11: भद्रे! मैंने उस राक्षस को इस विचार से मारा था कि मेरे जैसा पति पाकर तुझे वृद्धावस्था तक राक्षस के घर में न रहना पड़े॥11॥   |   mahabharat अध्याय 3.291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 291: श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल-बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.291.11 
मामासाद्य पतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि।
जरां व्रजेथा इति मे निहतोऽसौ निशाचर:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
भद्रे! मैंने उस राक्षस को इस विचार से मारा था कि मेरे जैसा पति पाकर तुझे वृद्धावस्था तक राक्षस के घर में न रहना पड़े॥11॥
 
Bhadra! I killed that demon with the thought that after getting a husband like me you may not have to live in a demon's house till your old age.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)