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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.29.8 
तं क्रोधं वर्जितं धीरै: कथमस्मद्विधश्चरेत्।
एतद् द्रौपदि संधाय न मे मन्यु: प्रवर्धते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
अतः मेरे जैसा मनुष्य उस क्रोध का उपयोग कैसे कर सकता है जिसे बुद्धिमान पुरुषों ने त्याग दिया है? हे द्रुपदपुत्री! ऐसा सोचकर मेरा क्रोध कभी नहीं बढ़ता। 8.
 
Therefore, how can a person like me use that anger which has been abandoned by the wise men? O daughter of Drupada, thinking this, my anger never increases. 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)