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mahabharat 3.29.7: जो बुद्धिमान पुरुष इन दोषों को देखते हैं और इस लोक तथा परलोक में परम कल्याण की इच्छा रखते हैं, उन्होंने क्रोध को जीत लिया है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.29.7 
एतान् दोषान् प्रपश्यद्भिर्जित: क्रोधो मनीषिभि:।
इच्छद्भि: परमं श्रेय इह चामुत्र चोत्तमम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो बुद्धिमान पुरुष इन दोषों को देखते हैं और इस लोक तथा परलोक में परम कल्याण की इच्छा रखते हैं, उन्होंने क्रोध को जीत लिया है ॥7॥
 
The wise men who see these defects and desire the highest welfare in this world as well as the next, have conquered anger. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)