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श्लोक 3.29.52  |
एतदात्मवतां वृत्तमेष धर्म: सनातन:।
क्षमा चैवानृशंस्यं च तत् कर्तास्म्यहमञ्जसा॥ ५२॥ |
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| अनुवाद |
| क्षमा और दया, ये ही विजित आत्माओं के गुण हैं और यही सनातन धर्म है। अतः मैं सचमुच क्षमा और दया को अपनाऊँगा ॥ 52॥ |
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| Forgiveness and mercy are the virtues of the conquered souls and this is the eternal Dharma. Therefore, I will truly adopt forgiveness and mercy. ॥ 52॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीयुधिष्ठिरसंवादे एकोनत्रिंशोऽध्याय:॥ २९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदी-युधिष्ठिरसंवादविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९॥
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