Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.29.50-51: भरतवंश के विनाश का यह बड़ा भयंकर समय है। भामिनी! मेरा तो पहले से ही यह दृढ़ मत है कि सुयोधन कभी क्षमा-वृत्ति धारण नहीं कर सकता, वह इसके योग्य नहीं है। मैं इसका पात्र हूँ, अतः क्षमा मेरी ही शरण में आती है। | mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कालोऽयं दारुण: प्राप्तो भरतानामभूतये।
निश्चितं मे सदैवैतत् पुरस्तादपि भाविनि॥ ५०॥
सुयोधनो नार्हतीति क्षमामेवं न विन्दति।
अर्हस्तत्राहमित्येवं तस्मान्मां विन्दते क्षमा॥ ५१॥
अनुवाद
भरतवंश के विनाश का यह बड़ा भयंकर समय है। भामिनी! मेरा तो पहले से ही यह दृढ़ मत है कि सुयोधन कभी क्षमा-वृत्ति धारण नहीं कर सकता, वह इसके योग्य नहीं है। मैं इसका पात्र हूँ, अतः क्षमा मेरी ही शरण में आती है।
This is a very terrible time for the destruction of the Bharat dynasty. Bhamini! I am already of the firm opinion that Suyodhan can never adopt this attitude of forgiveness, he is not worthy of it. I am worthy of it, hence forgiveness takes refuge in me only.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥