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श्लोक 3.29.45  |
इति गीता: काश्यपेन गाथा नित्यं क्षमावताम्।
श्रुत्वा गाथा: क्षमायास्त्वं तुष्य द्रौपदि मा क्रुध:॥ ४५॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार कश्यपजी ने सदैव क्षमाशील पुरुषों की कथा गाई है। द्रौपदी! इस क्षमा की कथा सुनकर संतुष्ट हो जाओ, क्रोध मत करो। |
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| In this way Kashyapa has always sung the tale of forgiving men. Draupadi! Be satisfied after hearing this tale of forgiveness, do not be angry. |
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