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mahabharat 3.29.44: जो मनुष्य सदैव क्षमा के द्वारा क्रोध को दबाये रहते हैं, वे उत्तम लोकों को प्राप्त होते हैं। इसलिए क्षमा को श्रेष्ठ माना गया है ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.29.44 
येषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमयाभिहत: सदा।
तेषां परतरे लोकास्तस्मात् क्षान्ति: परा मता॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सदैव क्षमा के द्वारा क्रोध को दबाये रहते हैं, वे उत्तम लोकों को प्राप्त होते हैं। इसलिए क्षमा को श्रेष्ठ माना गया है ॥ 44॥
 
Those people whose anger is always suppressed by forgiveness, attain the best of the worlds. Hence forgiveness is considered the best. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)