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mahabharat 3.29.41: हे कृष्ण! जिसका माहात्म्य इस प्रकार बताया गया है कि जिसमें ब्रह्म, सत्य, यज्ञ और जगत् प्रतिष्ठित हैं, उस क्षमा को मेरे जैसा मनुष्य कैसे त्याग सकता है?॥41॥   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.29.41 
तां क्षमां तादृशीं कृष्णे कथमस्मद्विधस्त्यजेत्।
यस्यां ब्रह्म च सत्यं च यज्ञा लोकाश्च धिष्ठिता:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हे कृष्ण! जिसका माहात्म्य इस प्रकार बताया गया है कि जिसमें ब्रह्म, सत्य, यज्ञ और जगत् प्रतिष्ठित हैं, उस क्षमा को मेरे जैसा मनुष्य कैसे त्याग सकता है?॥41॥
 
O Krishna! The importance of which has been described as such that in which Brahma, truth, sacrifice and the world are established, how can a person like me give up that forgiveness? ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)