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mahabharat 3.29.38: क्षमाशील पुरुष यज्ञ, ब्रह्म और तपस्वियों को जानने वालों से भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.29.38 
अति यज्ञविदां लोकान् क्षमिण: प्राप्नुवन्ति च।
अति ब्रह्मविदां लोकानति चापि तपस्विनाम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
क्षमाशील पुरुष यज्ञ, ब्रह्म और तपस्वियों को जानने वालों से भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं ॥38॥
 
Forgiving men attain higher realms than those who know the Yajnas, Brahman and ascetics. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)