श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.29.37 
क्षमा ब्रह्म क्षमा सत्यं क्षमा भूतं च भावि च।
क्षमा तप: क्षमा शौचं क्षमयेदं धृतं जगत्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
क्षमा ही ब्रह्म है, क्षमा ही सत्य है, क्षमा ही भूत है, क्षमा ही भविष्य है, क्षमा ही तप है और क्षमा ही पवित्रता है। क्षमा ही सम्पूर्ण जगत का पालन करती है ॥37॥
 
Forgiveness is Brahman, forgiveness is truth, forgiveness is the past, forgiveness is the future, forgiveness is penance and forgiveness is purity. Forgiveness alone sustains the entire world. ॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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