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mahabharat 3.29.3: इस संसार में क्रोध के कारण लोग नष्ट होते देखे जाते हैं; अतः मेरे जैसा मनुष्य संसार का नाश करने वाले क्रोध का प्रयोग दूसरों पर कैसे कर सकता है?॥3॥   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  3.29.3 
क्रोधमूलो विनाशो हि प्रजानामिह दृश्यते।
तत् कथं मादृश: क्रोधमुत्सृजेल्लोकनाशनम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में क्रोध के कारण लोग नष्ट होते देखे जाते हैं; अतः मेरे जैसा मनुष्य संसार का नाश करने वाले क्रोध का प्रयोग दूसरों पर कैसे कर सकता है?॥3॥
 
In this world people are seen to be destroyed due to anger; so how can a person like me use anger, which is destructive for the world, on others?॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)