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mahabharat 3.29.23: अतः सदाचारी पुरुष को सदैव क्रोध का त्याग कर देना चाहिए। वर्णाश्रम का पालन न करने वाला पुरुष तो अच्छा है, परन्तु क्रोध करने वाला पुरुष अच्छा नहीं होता - यह निश्चित है ॥23॥   |   mahabharat अध्याय 3.29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 29: युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.29.23 
तस्माच्छश्वत् त्यजेत् क्रोधं पुरुष: सम्यगाचरन्।
श्रेयान् स्वधर्मानपगो न क्रुद्ध इति निश्चितम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
अतः सदाचारी पुरुष को सदैव क्रोध का त्याग कर देना चाहिए। वर्णाश्रम का पालन न करने वाला पुरुष तो अच्छा है, परन्तु क्रोध करने वाला पुरुष अच्छा नहीं होता - यह निश्चित है ॥23॥
 
Therefore, a virtuous man should always renounce anger. A man who does not follow his Varnashrama is (relatively) good, but an angry man is not good - this is certain. ॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)