श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 289: श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित् का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.289.29 
महाराज्ये स्थितो दीप्ते न स्त्रियं हन्तुमर्हसि।
हतैवैषा यदा स्त्री च बन्धनस्था च ते वशे॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'राक्षसराज! लंका के प्रतापी सम्राट होकर आपको एक अबला स्त्री का वध नहीं करना चाहिए। स्त्री होने के कारण वह आपके वश में है, आपके घर में कैद है; इस अवस्था में तो वह मृत समान है।
 
‘King of demons! You, being the glorious emperor of Lanka, should not kill a helpless woman. Being a woman, she is in your control, imprisoned in your house; in this condition, she is as good as dead.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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