श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 289: श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित् का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  3.289.25-26 
लङ्कां प्रवेशयामासुस्तं रथं वाजिनस्तदा।
ददर्श रावणस्तं च रथं पुत्रविनाकृतम्॥ २५॥
स पुत्रं निहतं ज्ञात्वा त्रासात् सम्भ्रान्तमानस:।
रावण: शोकमोहार्तो वैदेहीं हन्तुमुद्यत:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
उस समय घोड़े उसी खाली रथ को लंकापुरी ले गए। रावण ने देखा कि उसके पुत्र का रथ उसके बिना ही लौट आया है। तब अपने पुत्र के मारे जाने का समाचार पाकर रावण का मन भय से व्याकुल हो उठा। वह शोक और मोह से व्याकुल होकर विदेह की पुत्री सीता को मारने के लिए उद्यत हो गया। 25-26
 
At that time the horses took the same empty chariot to Lankapuri. Ravana saw that his son's chariot has returned without him. Then Ravana's mind became disturbed with fear knowing that his son has been killed. He became agitated with grief and attachment and became ready to kill Videhan's daughter Sita. 25-26.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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