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श्लोक 3.289.21  |
तस्यासून् पावकस्पर्शै: सौमित्रि: पत्त्रिभिस्त्रिभि:।
यथा निरहरद् वीरस्तन्मे निगदत: शृणु॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| वीर सुमित्रकुमार ने अग्नि के समान प्रज्वलित तीन बाणों द्वारा किस प्रकार इन्द्रजित् के प्राण हर लिए, यह मैं तुम्हें बताता हूँ; सुनो॥21॥ |
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| Let me tell you how the brave Sumitra Kumar took the life of Indrajit with three arrows burning like fire; Listen. 21॥ |
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