श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 289: श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित् का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.289.17 
अकृताह्निकमेवैनं जिघांसुर्जितकाशिनम्।
शरैर्जघान संक्रुद्ध: कृतसंज्ञोऽथ लक्ष्मण:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रजीत विजय के हर्ष से चमक रहा था, उसने अभी नित्यकर्म भी नहीं किया था, उसी अवस्था में लक्ष्मणजी सचेत हो गए और उसे मार डालने की इच्छा से उस पर बाणों से प्रहार करने लगे ॥17॥
 
Indrajit was glowing with joy of victory. He had not even performed his daily rituals, and in that very state, Lakshman became conscious and started attacking him with arrows with the desire to kill him. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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