श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 289: श्रीराम-लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित् का वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.289.10 
इदमम्भ: कुबेरस्ते महाराज: प्रयच्छति।
अन्तर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परंतप॥ १०॥
 
 
अनुवाद
परंतप! महाराज कुबेर यह जल आपको इसलिए अर्पित कर रहे हैं कि इसे अपनी आँखों में लगाकर आप उन प्राणियों को देख सकें जो मोहवश अदृश्य हो गए हैं॥10॥
 
Parantapa! Maharaja Kubera is offering this water to you so that by applying it to your eyes you may be able to see the creatures that have become invisible due to the illusion.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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