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mahabharat 3.288.5: अनघ! राम, लक्ष्मण और सुग्रीव भी आपके बाणों का प्रहार सहन करने में समर्थ नहीं हैं, फिर वे आपके अनुयायी कैसे हो सकते हैं?॥5॥   |   mahabharat अध्याय 3.288: इन्द्रजित् का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 288: इन्द्रजित् का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.288.5 
रामलक्ष्मणसुग्रीवा: शरस्पर्शं न तेऽनघ।
समर्था: प्रतिसोढुं च कुतस्तदनुयायिन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अनघ! राम, लक्ष्मण और सुग्रीव भी आपके बाणों का प्रहार सहन करने में समर्थ नहीं हैं, फिर वे आपके अनुयायी कैसे हो सकते हैं?॥5॥
 
Anagh! Even Rama, Lakshmana and Sugreeva themselves are not capable of withstanding the attack of your arrows, then how can they be your followers?॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)