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mahabharat 3.288.25-26h: रावण का पुत्र अपनी माया से घिरा होने के कारण स्वयं किसी को दिखाई नहीं दे रहा था; परन्तु वह अपने बाणों से उन दोनों भाइयों के साथ-साथ समस्त वानरों को भी निरंतर घायल कर रहा था।   |   mahabharat अध्याय 3.288: इन्द्रजित् का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 288: इन्द्रजित् का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  3.288.25-26h 
तांश्च तौ चाप्यदृश्य: स शरैर्विव्याध राक्षस:॥ २५॥
स भृशं ताडयामास रावणिर्माययाऽऽवृत:।
 
 
अनुवाद
रावण का पुत्र अपनी माया से घिरा होने के कारण स्वयं किसी को दिखाई नहीं दे रहा था; परन्तु वह अपने बाणों से उन दोनों भाइयों के साथ-साथ समस्त वानरों को भी निरंतर घायल कर रहा था।
 
Because Ravana's son was enveloped in his illusion, he himself was not visible to anyone; but he was continuously wounding those two brothers as well as all the monkeys with his arrows. 25 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)