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श्लोक 3.288.17-18h  |
तमचिन्त्य प्रहारं स बलवान् वालिन: सुत:॥ १७॥
ससर्जेन्द्रजित: क्रोधाच्छालस्कन्धं तथाङ्गद:। |
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| अनुवाद |
| महाबली वलिनन्दन अंगदने इन्द्रजित् की गदाके प्रहारकी ओर ध्यान न देकर क्रोधपूर्वक साखूके वृक्षका तना उठाकर उस पर प्रहार किया ॥17 1/2॥ |
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| The mighty Valinandan Angadne, paying no heed to the blow of Indrajit's mace, raised the stem of the Sakhu tree angrily and hit him. 17 1/2॥ |
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