श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 288: इन्द्रजित् का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  3.288.17-18h 
तमचिन्त्य प्रहारं स बलवान् वालिन: सुत:॥ १७॥
ससर्जेन्द्रजित: क्रोधाच्छालस्कन्धं तथाङ्गद:।
 
 
अनुवाद
महाबली वलिनन्दन अंगदने इन्द्रजित् की गदाके प्रहारकी ओर ध्यान न देकर क्रोधपूर्वक साखूके वृक्षका तना उठाकर उस पर प्रहार किया ॥17 1/2॥
 
The mighty Valinandan Angadne, paying no heed to the blow of Indrajit's mace, raised the stem of the Sakhu tree angrily and hit him. 17 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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