श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 287: कुम्भकर्ण, वज्रवेग और प्रमाथीका वध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.287.1 
मार्कण्डेय उवाच
ततो निर्याय स्वपुरात् कुम्भकर्ण: सहानुग:।
अपश्यत् कपिसैन्यं तज्जितकाश्यग्रत: स्थितम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - युधिष्ठिर! कुम्भकर्ण ने अपने सेवकों के साथ नगर से प्रस्थान करके देखा कि विजय के हर्ष से सजी हुई वानर सेना उसके सामने खड़ी है।
 
Markandeya says - Yudhishthira! Kumbhakarna, after leaving his city with his servants, saw the monkey army standing in front of him, decorated with the joy of victory.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)