श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 286: प्रहस्त और धूम्राक्षके वधसे दु:खी हुए रावणका कुम्भकर्णको जगाना और उसे युद्धमें भेजना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.286.1 
मार्कण्डेय उवाच
तत: प्रहस्त: सहसा समभ्येत्य विभीषणम्।
गदया ताडयामास विनद्य रणकर्कश:॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तत्पश्चात युद्ध में घोर पराक्रम दिखाने वाले प्रहस्त ने अचानक विभीषण के पास पहुँचकर गर्जना करते हुए उस पर गदा से आक्रमण किया॥1॥
 
Markandeyaji says- Yudhishthir! Thereafter, Prahastha, who had shown ruthless bravery in battle, suddenly reached Vibhishana and roared and attacked him with his mace. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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