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mahabharat 3.284.27: उस समय वानरों के उछलने-कूदने और गिरने से इतनी धूल उड़ी कि सूर्य का तेज नष्ट हो गया और वह अदृश्य हो गया।27.   |   mahabharat अध्याय 3.284: अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 284: अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.284.27 
उत्पतद्भि: पतद्भिश्च निपतद्भिश्च वानरै:।
नादृश्यत तदा सूर्यो रजसा नाशितप्रभ:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उस समय वानरों के उछलने-कूदने और गिरने से इतनी धूल उड़ी कि सूर्य का तेज नष्ट हो गया और वह अदृश्य हो गया।27.
 
At that time, so much dust was raised due to the jumping and falling of the monkeys that the Sun's radiance was destroyed and it became invisible. 27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)