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mahabharat 3.284.1: मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! लंकारूपी उस वन में अन्न और जल प्रचुर मात्रा में था। फल-मूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे; इसलिए श्री रामचन्द्रजी ने अपनी सेना को वहीं पड़ाव डाला और विधिपूर्वक उसकी रक्षा करते रहे॥ 1॥   |   mahabharat अध्याय 3.284: अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 284: अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.284.1 
मार्कण्डेय उवाच
प्रभूतान्नोदके तस्मिन् बहुमूलफले वने।
सेनां निवेश्य काकुत्स्थो विधिवत् पर्यरक्षत॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! लंकारूपी उस वन में अन्न और जल प्रचुर मात्रा में था। फल-मूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे; इसलिए श्री रामचन्द्रजी ने अपनी सेना को वहीं पड़ाव डाला और विधिपूर्वक उसकी रक्षा करते रहे॥ 1॥
 
Markandeyji says- Yudhishthira! There was plenty of food and water in that forest of Lanka. Fruits and roots were available in abundance; therefore, Shri Ramchandraji camped his army there and kept protecting it methodically.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)