अध्याय 284: अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम
श्लोक 1: मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! लंकारूपी उस वन में अन्न और जल प्रचुर मात्रा में था। फल-मूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे; इसलिए श्री रामचन्द्रजी ने अपनी सेना को वहीं पड़ाव डाला और विधिपूर्वक उसकी रक्षा करते रहे॥ 1॥
श्लोक 2: यहाँ रावण ने शास्त्रविधि से निर्मित युद्ध सामग्री (मशीनगन आदि) एकत्रित करना आरम्भ किया। लंका की सीमा-दीवारें और नगरद्वार अत्यंत सुदृढ़ थे; अतः वह स्वाभाविक रूप से दुर्गम थी - किसी भी आक्रमणकारी का वहाँ पहुँचना अत्यंत कठिन था॥2॥
श्लोक 3: नगर के चारों ओर सात गहरी खाइयाँ थीं, जिनमें भरपूर पानी भरा रहता था और उनमें मछलियाँ, मगरमच्छ आदि जलीय जीव रहते थे। इन खाइयों में चारों ओर खैर (लकड़ी) की खूँटियाँ गड़ी हुई थीं।
श्लोक 4: 'मजबूत द्वार लगाए गए थे और बमबारी करने वाले यंत्र अपने-अपने स्थान पर रखे गए थे। इनके अतिरिक्त, वहाँ बहुत-से सींग और गोले जमा किए गए थे। इन सब कारणों से इन खाइयों को पार करना बहुत कठिन था। यद्यपि ये खाइयाँ विषैले सर्पों, सैनिकों, शल्य द्रव (लाख) और धूल के समूहों से सुरक्षित थीं, फिर भी वे दुर्गम थीं।॥4॥
श्लोक 5: वे खाइयाँ भी बन्दूकें, अलाट (बनाठी), बाण, तोमर, तलवारें, कुल्हाड़ी, मोम के हथौड़े और तोपें आदि शस्त्रों के संग्रह के कारण अगम्य थीं।5॥
श्लोक 6: शहर के सभी द्वारों पर छिपने के लिए मीनारें थीं। इन्हें स्थिर सैनिक कहते थे और जो सैनिक शहर में घूम-घूमकर सुरक्षा के लिए नियुक्त थे, उन्हें चल सैनिक कहते थे। इनमें से ज़्यादातर पैदल सैनिक थे और कई हाथी-घुड़सवार भी थे।
श्लोक 7-8: (श्री रामचन्द्र की आज्ञा से) महाबली अंगद दूत बनकर लंकापुरी के द्वार पर आए। राक्षसराज रावण को उनके आगमन की सूचना दी गई। तब आज्ञा पाकर वे निर्भय होकर नगर में प्रवेश कर गए। लाखों राक्षसों के बीच जाते हुए अंगद बादलों से घिरे हुए सूर्यदेव के समान शोभा पा रहे थे।
श्लोक 9: अपने मन्त्रियों से घिरे हुए बैठे हुए पुलस्त्यनन्दन रावण के पास पहुँचकर कुशल वक्ता अंगद रावण को सम्बोधित करके श्री रामचन्द्रजी का सन्देश इस प्रकार कहने लगे-॥9॥
श्लोक 10: राजन! कोसलदेश के महाराज यशस्वी श्री रामचन्द्रजी ने जो समयानुकूल सन्देश तुम्हें भेजा है, उसे सुनो और उसके अनुसार आचरण करो॥10॥
श्लोक 11: जो राजा अपने मन को वश में नहीं रखता और अन्याय में प्रवृत्त रहता है, उसके आश्रय में आने वाले नगर और देश भी अन्यायी हो जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं।॥11॥
श्लोक 12: सीताका बलपूर्वक हरण करके तुमने अकेले ही मेरा अपराध किया है, परन्तु इसके कारण अन्य निरपराध लोग भी मारे जाएँगे।॥12॥
श्लोक 13-14: तूने पहले बल और अहंकार के मद में चूर होकर वनवासी ऋषियों का वध किया था, देवताओं का अपमान किया था, राजाओं का वध किया था और रोती-बिलखती स्त्रियों का अपहरण किया था। अब तू उन सब अत्याचारों का फल भोगेगा॥13-14॥
श्लोक 15: मैं तुझे तेरे मन्त्रियों सहित मार डालूँगा। यदि तू साहस रखता है, तो युद्ध कर और अपना पराक्रम दिखा। हे रात्रिचर! मैं मनुष्य हूँ, फिर भी मेरे धनुष का बल देख॥ 15॥
श्लोक 16: जनकपुत्री सीता को छोड़ दो, अन्यथा तुम मेरे हाथों से कभी जीवित नहीं बच सकोगे। मैं अपने तीखे बाणों से इस संसार को राक्षसों से वीरान कर दूँगा।॥16॥
श्लोक 17: राजा रावण श्री राम के दूत के मुख से ऐसे कठोर शब्द सुनकर सहन नहीं कर सका और क्रोध से मूर्छित हो गया।
श्लोक 18: तब चारों रक्षपाल अपने स्वामी का संकेत समझकर अपने स्थान से उठे और अंगद के शरीर के चारों अंगों को उसी प्रकार पकड़ने लगे, जैसे पक्षी सिंह को पकड़ते हैं॥18॥
श्लोक 19: इस प्रकार अंगद अपने शरीर से चिपके हुए चारों राक्षसों को लेकर आकाश में कूद पड़े और महल की छत पर चढ़ गए।
श्लोक 20: कूदते समय चारों राक्षस उनके वेग से मुक्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। राक्षसों की छाती फट गई और भयंकर चोटों के कारण उन्हें बहुत पीड़ा हुई।
श्लोक 21: अंगद छत पर चढ़ गए और फिर महल की प्राचीर से कूदकर लंकापुरी पार करते हुए सुवेल पर्वत के पास पहुँच गए।
श्लोक 22: फिर तेजस्वी वानर अंगद कोसलराज श्री रामचंद्र से मिले और उन्हें रावण के दरबार की सारी बातें बताईं। श्री राम ने अंगद की बहुत प्रशंसा की। फिर वे विश्राम करने लगे।
श्लोक 23: तत्पश्चात् भगवान् राम ने वायु के समान वेगवान सम्पूर्ण वानरों की सेना के साथ लंका पर आक्रमण कर दिया और उसकी दीवारें नष्ट कर दीं॥ 23॥
श्लोक 24: नगर का दक्षिणी द्वार प्रवेश करने में बहुत कठिन था, परन्तु लक्ष्मण ने विभीषण और जाम्बवान को आगे धकेलकर उसे भी कुचल दिया॥ 24॥
श्लोक 25: तत्पश्चात् उन्होंने दस खरब कुशल वानरों की सेना लेकर लंका में प्रवेश किया, जिनका आकार हथेली के समान था और जिनका रंग श्वेत और लाल था॥ 25॥
श्लोक 26: उनकी भुजाएँ, जंघाएँ, हाथ और पिंडलियाँ (पिण्डली) - ये सभी अंग विशाल थे और उनके अंगों की चमक धुएँ के समान काली थी। तीन करोड़ रीछ सैनिक भी उनके साथ लंका में गए और युद्ध के लिए तैयार खड़े थे।
श्लोक 27: उस समय वानरों के उछलने-कूदने और गिरने से इतनी धूल उड़ी कि सूर्य का तेज नष्ट हो गया और वह अदृश्य हो गया।27.
श्लोक 28-29: हे राजन! लंका की सीमाएँ सब ओर से कपिलवर्ण के रंग की प्रतीत हो रही थीं, क्योंकि उनमें वानरों का निवास था, जिनका रंग धान के पुष्प के समान, आभा मौलसिरी के पुष्प के समान, प्रभाव प्रातःकालीन सूर्य के समान और रंग श्वेत भांग के समान था। लंका में निवास करने वाले स्त्रियों और वृद्धों सहित सभी राक्षस आश्चर्यचकित होकर यह दृश्य देख रहे थे॥28-29॥
श्लोक 30: वानर सैनिकों ने ऊँचे महलों के रत्नजटित स्तंभों और किनारियों को तोड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने वहाँ लगी तोपों और अन्य तोपों के ऊपरी भाग तोड़कर फेंक दिए।
श्लोक 31: चक्राकार तोपें, सींग और गिट्टी लेकर वानरों ने अपनी भुजाओं के बल से उन्हें लंका पर फेंकना आरम्भ कर दिया और बड़ा शोर मचाने लगे।
श्लोक 32: सैकड़ों रात्रिचर जीव जो चारदीवारी की रक्षा के लिए वहां खड़े थे, बंदरों द्वारा भगाए जाने पर सभी भाग गए।
श्लोक 33: तत्पश्चात् राक्षसराज रावण की आज्ञा पाकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षस लाखों की संख्या में समूह बनाकर नगर से बाहर निकले। उन सबके रूप बड़े ही भयानक थे।
श्लोक 34: वह चारदीवारी की शोभा बढ़ाते हुए वनवासी वानरों पर अस्त्र-शस्त्र बरसाकर उन्हें भगाने लगा और अपना महान पराक्रम दिखाने लगा ॥34॥
श्लोक 35: उड़द की दाल के ढेर के समान काले उन भयंकर रात्रिचर जीवों ने युद्ध करके पुनः सीमा की दीवार को बंदरों से खाली कर दिया।
श्लोक 36: उनके भालों के प्रहार से शरीर छिन्न-भिन्न हो जाने से अनेक महावानर गिर पड़े। इसी प्रकार, अनेक रात्रिचर जीव वानरों के द्वारा खंभों पर प्रहार किए जाने से युद्धभूमि से भाग गए और अनेक वहीं मर गए।
श्लोक 37: तत्पश्चात्, वीर राक्षस वानरों से लड़ने लगे, एक-दूसरे के बाल पकड़ लिए, और एक-दूसरे को अपने नाखूनों और दांतों से काटने लगे।
श्लोक 38: दोनों ओर से गर्जना करते हुए वानर और राक्षस इस प्रकार लड़े कि मरकर भूमि पर गिर जाने पर भी उन्होंने एक-दूसरे को नहीं छोड़ा।
श्लोक 39: उधर भगवान राम भी बादलों की तरह बाणों की वर्षा करने लगे। वे बाण लंका में घुसकर वहाँ खड़े राक्षसों का संहार करने लगे।
श्लोक 40: पीड़ा और थकान को दूर करके सुमित्रापुत्र लक्ष्मण जैसे बलवान धनुर्धर ने भी निर्देश देकर किले के अन्दर रहने वाले राक्षसों को नाराच नामक बाणों से मारना आरम्भ कर दिया।
श्लोक 41: इस प्रकार लंका में भारी नरसंहार करके वानर सेना अपने उद्देश्य में विजयी होकर श्री रघुनाथ की आज्ञा से युद्ध छोड़कर अपने शिविर में लौट गई।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥