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mahabharat 3.283.46: श्री रामचन्द्रजी अभी समुद्र के तट पर ही थे कि राक्षसराज रावण का भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ उनसे मिलने आया॥46॥   |   mahabharat अध्याय 3.283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.283.46 
तत्रस्थं स तु धर्मात्मा समागच्छद् विभीषण:।
भ्राता वै राक्षसेन्द्रस्य चतुर्भि: सचिवै: सह॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी अभी समुद्र के तट पर ही थे कि राक्षसराज रावण का भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ उनसे मिलने आया॥46॥
 
Shri Ramchandra ji was still on the sea shore when the brother of demon king Ravana, religious soul Vibhishana came to meet him with his four ministers. 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)