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mahabharat 3.283.44: उसी विधि से रघुनाथजी ने समुद्र पर एक पुल बनाया जो सौ योजन लम्बा और दस योजन चौड़ा था ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 3.283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.283.44 
तेनोपायेन काकुत्स्थ: सेतुबन्धमकारयत्।
दशयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
उसी विधि से रघुनाथजी ने समुद्र पर एक पुल बनाया जो सौ योजन लम्बा और दस योजन चौड़ा था ॥ 44॥
 
Using the same method, Raghunathji constructed a bridge over the sea which was a hundred yojanas long and ten yojanas wide. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)