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mahabharat 3.283.42: वह जो भी लकड़ी, तिनका या पत्थर अपने हाथों से उठाकर मेरे अन्दर डालेगा, मैं उसे जल के ऊपर रखूँगा। वही तुम्हारे लिए पुल बन जाएगा।॥42॥   |   mahabharat अध्याय 3.283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.283.42 
स यत् काष्ठं तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मयि।
सर्वं तद् धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
वह जो भी लकड़ी, तिनका या पत्थर अपने हाथों से उठाकर मेरे अन्दर डालेगा, मैं उसे जल के ऊपर रखूँगा। वही तुम्हारे लिए पुल बन जाएगा।॥42॥
 
Whatever wood, straw or stone he picks up with his hands and puts inside me, I will hold it above the water. That will become a bridge for you.'॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)