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mahabharat 3.283.30: मैं किसी भी प्रकार से इस सागर की पूजा आरम्भ करूँगा। इसके तट पर बिना कुछ खाए-पिए बैठूँगा। यह अवश्य ही मेरे सामने प्रकट होकर मुझे मार्ग दिखाएगा॥30॥   |   mahabharat अध्याय 3.283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.283.30 
अहं त्विमं जलनिधिं समारप्स्याम्युपायत:।
प्रतिशेष्याम्युपवसन् दर्शयिष्यति मां तत:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
मैं किसी भी प्रकार से इस सागर की पूजा आरम्भ करूँगा। इसके तट पर बिना कुछ खाए-पिए बैठूँगा। यह अवश्य ही मेरे सामने प्रकट होकर मुझे मार्ग दिखाएगा॥30॥
 
‘I will start worshipping this ocean by any means. I will sit on its shores without eating or drinking anything. It will surely appear before me and show me the way.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)