अध्याय 283: वानर-सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना
श्लोक 1: मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तत्पश्चात सुग्रीव की आज्ञा से महाप्रतापी वानर योद्धा भगवान श्री राम के पास पहुँचने लगे, जो माल्यवान पर्वत पर लक्ष्मण आदि के साथ बैठे हुए थे॥1॥
श्लोक 2: सबसे पहले श्री रामचन्द्रजी की सेवा में बालि के ससुर श्रीमान् सुषेण उपस्थित हुए। उनके साथ एक हजार करोड़ (दस अरब) वेगवान वानरों की सेना थी॥2॥
श्लोक 3: तभी शक्तिशाली वानर राजा गज और गवय एक-एक अरब लोगों की सेना के साथ अलग-अलग आते दिखाई दिए।
श्लोक 4: महाराज! गोलंगुल (लंगूर) प्रजाति का वह वानर गवाक्ष, जो देखने में बहुत भयानक था, साठ हजार करोड़ (छह खरब) वानरों की सेना लेकर प्रकट हुआ।
श्लोक 5: गंधमादन पर्वत पर रहने वाले गंधमादन नामक प्रसिद्ध वानर अपने साथ दस खरब वानरों की सेना लेकर आए थे ॥5॥
श्लोक 6: पनस नामक एक बुद्धिमान और शक्तिशाली वानर अपने साथ 57 करोड़ लोगों की सेना लेकर आया था।
श्लोक 7: वानरों में सबसे वृद्ध और वीर श्री दधिमुख अपने साथ भयंकर तेज से युक्त वानरों की एक विशाल सेना लेकर आए ॥7॥
श्लोक 8: जाम्बवान्, जिनके मुख (ललाट) पर तिलक लगा हुआ था और जो महाबली योद्धा थे, वे वहाँ दस करोड़ काले भालुओं की सेना के साथ दिखाई दिए।
श्लोक 9: महाराज! ये तथा अन्य अनेक वानर सेनापति, जिनकी संख्या असंख्य थी, श्री रामचन्द्रजी के कार्य के लिए वहाँ एकत्र हुए थे।
श्लोक 10: उनके शरीर पर्वत शिखरों के समान प्रतीत हो रहे थे। वे सब-के-सब सिंहों के समान गर्जना करते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे। उन सबकी सम्मिलित ध्वनि अत्यन्त भयानक प्रतीत हो रही थी॥10॥
श्लोक 11: कुछ तो पहाड़ की चोटियों जितने ऊँचे थे, कुछ भैंसों जैसे मोटे और काले। कुछ बंदर पतझड़ के बादलों जैसे सफ़ेद दिख रहे थे, और कुछ के चेहरे सिंदूर जैसे लाल थे।
श्लोक 12: वानर सैनिक सब ओर से इकट्ठे होकर उछलते, गिरते, उछलते और धूल उड़ाते हुए आ रहे थे॥12॥
श्लोक 13: वानरों की वह विशाल सेना पूर्ण समुद्र के समान प्रतीत हो रही थी। उस समय सुग्रीव की आज्ञा से सारी सेना ने माल्यवान पर्वत के पास डेरा डाला।
श्लोक 14-15: तदनन्तर, जब वे सभी महापुरुष वानर सब ओर से एकत्र हो गए, तब शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ समय में भगवान् राम सुग्रीव के साथ युद्ध के लिए चल पड़े। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे उस सेना के साथ युद्ध-पंक्ति में लीन होकर समस्त लोकों का विनाश करने जा रहे हैं॥ 14-15॥
श्लोक 16: उस सेना के अग्रभाग में वायुपुत्र हनुमान जी उपस्थित थे और पीछे की ओर सुमित्रापुत्र लक्ष्मण जी, जो किसी से नहीं डरते थे, रक्षा कर रहे थे।
श्लोक 17: रघुवंशी वीर श्री राम और लक्ष्मण दोनों ही छिपकली की खाल से बने दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहों से घिरे हुए चंद्रमा और सूर्य के समान वानर-जाति के मंत्रियों के बीच विचरण कर रहे थे॥17॥
श्लोक 18: भगवान राम के सामने वे सभी वानर सैनिक, शोरा, पत्थर और चट्टानों के रूप में हथियारों से लैस होकर, सूर्योदय के समय विशाल पके हुए धान के खेतों की तरह लग रहे थे।
श्लोक 19: वह विशाल वानर सेना नल, नील, अंगद, क्रथ, मैन्द और द्विविद से सुरक्षित होकर श्री रामचन्द्रजी का कार्य सिद्ध करने के लिए आगे बढ़ती रही।
श्लोक 20-21: विभिन्न शुभ एवं उत्कृष्ट पर्वत शिखरों पर, जहाँ फल-मूल, मधु और कंद प्रचुर मात्रा में थे तथा जहाँ जल सहज रूप से उपलब्ध था, डेरा डालकर वह वानरों की सेना बिना किसी बाधा के खारे समुद्र तक पहुँच गई।
श्लोक 22: असंख्य ध्वजाओं और पताकाओं से सुसज्जित वह विशाल सेना दूसरे सागर के समान प्रतीत हो रही थी। समुद्र तट के निकट वन में पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला।
श्लोक 23: तत्पश्चात् भगवान् श्री रामजी ने प्रमुख वानरों के बीच बैठकर सुग्रीव से यह समयोचित बात कही-॥23॥
श्लोक 24: ‘मित्रो! हमारी सेना बहुत बड़ी है और हमारे सामने जो समुद्र है, उसे पार करना अत्यंत कठिन है। ऐसी स्थिति में समुद्र पार करने का सर्वोत्तम उपाय क्या है, यह तुम लोग क्या समझते हो?’॥24॥
श्लोक 25: तब वहाँ उपस्थित अन्य बहुत से वानर, जो अत्यन्त अभिमानी थे, कहने लगे कि ‘हम समुद्र को पार करने में समर्थ हैं, परन्तु सभी लोग उसे पार नहीं कर सकते।’॥ 25॥
श्लोक 26: कुछ वानरों ने बड़ी नावों द्वारा समुद्र पार करने का निश्चय व्यक्त किया। कुछ ने नाव, डोंगी आदि अनेक साधनों से समुद्र पार करने का सुझाव दिया। परन्तु श्री रामचन्द्रजी ने उनकी सलाह स्वीकार न करके सबको सान्त्वना देते हुए कहा -॥26॥
श्लोक 27: हे प्रभु! सभी वानरों में सौ योजन विशाल समुद्र को पार करने की शक्ति नहीं होती; अतः तुम्हारा यह निर्णय सर्वमान्य सिद्धान्त के रूप में स्वीकार्य नहीं है। 27॥
श्लोक 28: हमारे पास इतनी बड़ी सेना को पार ले जाने के लिए पर्याप्त नावें नहीं हैं। (यदि हम कहें कि हम व्यापारियों के जहाजों का उपयोग करते हैं, तो) मेरे जैसा मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए व्यापारियों के व्यापार को कैसे हानि पहुँचा सकता है?॥ 28॥
श्लोक 29: 'अगर हम नाव आदि से यात्रा करेंगे, तो हमारी सेना बिखरकर दूर तक फैल जाएगी। ऐसे में, शत्रु अवसर पाकर उसे नष्ट कर सकता है। इसलिए डोंगी या नाव आदि में बैठकर नदी पार करने का विचार मुझे उचित नहीं लगता।'
श्लोक 30: मैं किसी भी प्रकार से इस सागर की पूजा आरम्भ करूँगा। इसके तट पर बिना कुछ खाए-पिए बैठूँगा। यह अवश्य ही मेरे सामने प्रकट होकर मुझे मार्ग दिखाएगा॥30॥
श्लोक 31: यदि वह प्रकट होकर मुझे मार्ग न दिखाए, तो मैं उसे उन महान दिव्य अस्त्रों से भस्म कर दूँगा, जो अग्नि और वायु से भी अधिक तेजस्वी हैं और जिनसे कभी चूकते नहीं।॥31॥
श्लोक 32: ऐसा कहकर श्री राम और लक्ष्मण ने जल पिया, समुद्र के किनारे कुशा बिछाई और उस पर लेटकर विधिपूर्वक धरना किया ॥32॥
श्लोक 33: तब नदियों और सरिताओं के स्वामी श्रीमन समुद्रदेव जलचरों के साथ प्रकट होकर श्री रामजी को स्वप्न में दिखाई दिए ॥33॥
श्लोक 34: वे सैकड़ों रत्नों से घिरे हुए थे। उन्होंने श्री राम को 'कौसल्यानंदन' कहकर संबोधित किया और मधुर वाणी में कहा-॥34॥
श्लोक 35: हे पुरुषश्रेष्ठ! आप मुझे बताइए, मैं यहाँ आपकी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? सगर के पुत्रों द्वारा पोषित होने के कारण मैं भी इक्ष्वाकु वंश का हूँ और आपका भाई हूँ।' यह सुनकर श्री रामचंद्रजी ने उनसे कहा-॥35॥
श्लोक 36: नाद-नदीश्वर! मैं अपनी सेना के लिए आपके द्वारा दिया गया मार्ग चाहता हूँ, जिससे मैं जाकर पुलस्त्यकुलांगार दशमुख रावण का वध कर सकूँ।
श्लोक 37: यदि इस प्रकार विनती करने पर भी तुम मुझे मार्ग न दोगे तो मैं दिव्यास्त्रों से अभिमंत्रित बाणों द्वारा तुम्हें सुखा डालूँगा ॥37॥
श्लोक 38: श्री रामजी के ये वचन सुनकर वरुणालय समुद्र व्याकुल हो गया और उठकर हाथ जोड़कर बोला-॥38॥
श्लोक 39: श्री राम! मैं आपका सामना नहीं करना चाहता, न ही आपके मार्ग में बाधा डालना चाहता हूँ। मेरी बात सुनो और मेरी बात सुनकर जो कर्तव्य करना हो, करो॥ 39॥
श्लोक 40: यदि इसी समय मैं आपकी आज्ञा से आपको और आपकी सेना को लंका जाने का मार्ग दे दूँ, तो दूसरे लोग भी अपने धनुष के बल से मुझे उसी प्रकार आज्ञा देंगे॥40॥
श्लोक 41: आपकी सेना में नल नाम का एक वानर है, जो शिल्पियों द्वारा भी आदरणीय है। वह बलवान नल दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा का पुत्र है॥ 41॥
श्लोक 42: वह जो भी लकड़ी, तिनका या पत्थर अपने हाथों से उठाकर मेरे अन्दर डालेगा, मैं उसे जल के ऊपर रखूँगा। वही तुम्हारे लिए पुल बन जाएगा।॥42॥
श्लोक 43: यह कहकर समुद्र अंतर्धान हो गया। तब श्रीराम उठे और नल से कहा - 'तुम समुद्र पर पुल बनाओ। मैं जानता हूँ कि तुममें यह कार्य करने की शक्ति है।' 43.
श्लोक 44: उसी विधि से रघुनाथजी ने समुद्र पर एक पुल बनाया जो सौ योजन लम्बा और दस योजन चौड़ा था ॥ 44॥
श्लोक 45: आज भी वह संसार में 'नल सेतु' के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीराम की आज्ञा मानकर समुद्र ने उस पर्वतरूपी सेतु को अपने ऊपर धारण कर लिया। 45.
श्लोक 46: श्री रामचन्द्रजी अभी समुद्र के तट पर ही थे कि राक्षसराज रावण का भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ उनसे मिलने आया॥46॥
श्लोक 47: महाहृदयी श्रीराम ने बड़े उत्साह से उनका स्वागत किया। उस समय सुग्रीव के मन में यह शंका उत्पन्न हुई कि 'यह व्यक्ति शत्रु का गुप्तचर हो सकता है।' 47.
श्लोक 48: तथापि, उसके सच्चे प्रयास, सदाचार और मुख, नेत्र आदि से प्रकट हुए भावों का भली-भाँति मूल्यांकन करके, जब भगवान् रामजी पूर्णतः संतुष्ट हो गए, तब उन्होंने विभीषण का बहुत आदर किया ॥48॥
श्लोक 49: उन्होंने उसे सभी राक्षसों के राजा के रूप में भी अभिषिक्त किया और उसे लक्ष्मण का मित्र और सलाहकार बनाया।
श्लोक 50: हे मनुष्यों के स्वामी! विभीषण की सलाह पर भगवान राम और उनकी सेना ने उसी पुल का उपयोग करके केवल एक महीने में समुद्र पार किया।
श्लोक 51: तत्पश्चात् लंका की सीमा पर पहुँचकर उन्होंने वहाँ के बहुत से बड़े-बड़े उद्यानों को वानरों से नष्ट करवा दिया ॥51॥
श्लोक 52: रावण के दो मंत्री शुक और सारण, वानर वेश धारण करके गुप्तचर बनकर सेना में घुस आए। विभीषण ने उन्हें पहचान लिया और बंदी बना लिया।
श्लोक 53: जब वे दोनों राक्षस अपने राक्षसी रूप में प्रकट हुए, तो भगवान राम ने उन्हें अपनी सेना दिखाई और फिर उन्हें मुक्त कर दिया।
श्लोक 54: लंकापुरी के उद्यान में वानर सेना को तैनात करके श्री रघुनाथजी ने बुद्धिमान वानर अंगद को दूत बनाकर रावण के पास भेजा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥