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mahabharat 3.282.55-57h: तब पक्षीराज सम्पाती ने हमें यह कहकर प्रोत्साहित किया : ‘वानरों! मैं रावण को जानता हूँ। मैंने उसकी महान नगरी लंका देखी है। वह समुद्र के उस पार त्रिकूटगिरि की गुफाओं में स्थित है। विदेहकुमारी सीता अवश्य ही वहाँ होंगी, मैं इसके विषय में और कुछ नहीं सोच रहा हूँ।’॥55-56 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना  »  श्लोक 55-57h
 
 
श्लोक  3.282.55-57h 
सोऽस्मानुत्थापयामास वाक्येनानेन पक्षिराट्॥ ५५॥
रावणो विदितो मह्यं लङ्का चास्य महापुरी।
दृष्टा पारे समुद्रस्य त्रिकूटगिरिकन्दरे॥ ५६॥
भवित्री तत्र वैदेही न मेऽस्त्यत्र विचारणा।
 
 
अनुवाद
तब पक्षीराज सम्पाती ने हमें यह कहकर प्रोत्साहित किया : ‘वानरों! मैं रावण को जानता हूँ। मैंने उसकी महान नगरी लंका देखी है। वह समुद्र के उस पार त्रिकूटगिरि की गुफाओं में स्थित है। विदेहकुमारी सीता अवश्य ही वहाँ होंगी, मैं इसके विषय में और कुछ नहीं सोच रहा हूँ।’॥55-56 1/2॥
 
‘Then the bird king Sampati encouraged us by saying the following. ‘Monkeys! I know Ravana. I have seen his great city Lanka. It is situated in the caves of Trikutagiri on the other side of the sea. Videha Kumari Sita must be there, I am not thinking otherwise about this.’॥ 55-56 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)