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mahabharat 3.282.44: फिर हम मलयाचल पर्वत पर चढ़ गए और समुद्र को देखने लगे। उसकी विशालता देखकर हमारा मन दुःख से भर गया। हम उदास और व्यथित हो गए। हमारे बचने की कोई उम्मीद नहीं थी।   |   mahabharat अध्याय 3.282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.282.44 
ततो मलयमारुह्य पश्यन्तो वरुणालयम्।
विषण्णा व्यथिता: खिन्ना निराशा जीविते भृशम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
फिर हम मलयाचल पर्वत पर चढ़ गए और समुद्र को देखने लगे। उसकी विशालता देखकर हमारा मन दुःख से भर गया। हम उदास और व्यथित हो गए। हमारे बचने की कोई उम्मीद नहीं थी।
 
‘Then we climbed the Malayachal and started looking at the sea. Seeing its vastness our hearts were filled with sorrow. We became sad and distressed. We had no hope of survival.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)