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mahabharat 3.282.4: प्रातःकाल धर्मात्मा श्री रामजी को राक्षसों के घर में बंदी अपनी पत्नी सीता का स्मरण आया और वे दुःखी होकर वीर लक्ष्मण से इस प्रकार बोले -॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.282.4 
प्रभाते लक्ष्मणं वीरमभ्यभाषत दुर्मना:।
सीतां संस्मृत्य धर्मात्मा रुद्धां राक्षसवेश्मनि॥ ४॥
 
 
अनुवाद
प्रातःकाल धर्मात्मा श्री रामजी को राक्षसों के घर में बंदी अपनी पत्नी सीता का स्मरण आया और वे दुःखी होकर वीर लक्ष्मण से इस प्रकार बोले -॥4॥
 
In the morning, the virtuous Sri Rama remembered his wife Sita imprisoned in the house of the demons. In a sad mood, he spoke to the brave Lakshmana as follows -॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)