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mahabharat 3.282.17: लक्ष्मण! मैं न तो मूर्ख हूँ, न कृतघ्न हूँ, न क्रूर हूँ। सीता को ढूँढ़ने के लिए मैंने जो प्रयत्न किए हैं, उन्हें सुनो॥ 17॥   |   mahabharat अध्याय 3.282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 282: श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान‍्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.282.17 
नास्मि लक्ष्मण दुर्मेधा नाकृतज्ञो न निर्घृण:।
श्रूयतां य: प्रयत्नो मे सीतापर्येषणे कृत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! मैं न तो मूर्ख हूँ, न कृतघ्न हूँ, न क्रूर हूँ। सीता को ढूँढ़ने के लिए मैंने जो प्रयत्न किए हैं, उन्हें सुनो॥ 17॥
 
Lakshmana! I am neither foolish, nor ungrateful, nor cruel. Listen to the efforts I have made to find Sita.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)