श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 281: रावण और सीताका संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.281.5 
न कल्पवृक्षसदृशो यत्नादपि विभूषित:।
श्मशानचैत्यद्रुमवद् भूषितोऽपि भयंकर:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि उसने वस्त्र और आभूषणों से अपने को भली-भाँति सुसज्जित कर रखा था, फिर भी वह कल्पवृक्ष के समान शोभायमान नहीं हो रहा था; प्रत्युत श्मशान के चैत्य वृक्ष के समान अलंकृत होने पर भी वह भयंकर प्रतीत हो रहा था ॥5॥
 
Although he had carefully adorned himself with clothes and ornaments, he did not appear as delightful as the Kalpavriksha; rather, like the Chaitya tree in a cremation ground, despite being decorated, he appeared fearsome. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)