श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 281: रावण और सीताका संवाद  »  श्लोक 26-28h
 
 
श्लोक  3.281.26-28h 
श्रुत्वा तद् रावणो वाक्यं सीतयोक्तं सुनिष्ठुरम्॥ २६॥
प्रत्याख्यातोऽपि दुर्मेधा: पुनरेवाब्रवीद् वच:।
काममङ्गानि मे सीते दुनोतु मकरध्वज:॥ २७॥
न त्वामकामां सुश्रोणीं समेष्ये चारुहासिनीम्।
 
 
अनुवाद
सीता के मुख से ये अत्यन्त क्रूर वचन सुनकर और उनका शून्य उत्तर पाकर दुष्टबुद्धि रावण पुनः इस प्रकार कहने लगा - 'सीते! यदि कामदेव भी मेरे शरीर को कष्ट देते रहें, तो भी मैं तुम्हारे समान मनोहर मुस्कान वाली सुन्दरी को मनाए बिना तुम्हारे साथ समागम नहीं करूँगा।॥ 26-27 1/2॥
 
Hearing these extremely cruel words from Sita's mouth and receiving a blank reply from her, the evil-minded Ravana again started saying thus - 'Sita! Even if Kaamdev (God of love) keeps tormenting my body, I will not have intercourse with you without persuading a beautiful girl like you who has a charming smile.॥ 26-27 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)