श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 281: रावण और सीताका संवाद  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  3.281.19-20 
असकृद् वदतो वाक्यमीदृशं राक्षसेश्वर॥ १९॥
विषादयुक्तमेतत् ते मया श्रुतमभाग्यया।
तद् भद्रसुख भद्रं ते मानसं विनिवर्त्यताम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
हे दैत्यराज! आपके मुख से अनेक बार ऐसे दुःखद वचन निकले हैं और मुझ अभागे को उन्हें बार-बार सुनना पड़ा है। भद्रसुख! आपका कल्याण हो। मुझसे अपना मन हटा लीजिए।॥19-20॥
 
‘O King of demons! Such painful words have come out of your mouth many times and I, the unfortunate one, have had to listen to them again and again. Bhadrasukh! May you be blessed. Turn your mind away from me.॥ 19-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)