श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 281: रावण और सीताका संवाद  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.281.13 
गन्धर्वाप्सरसो भद्रे मामापानगतं सदा।
उपतिष्ठन्ति वामोरु यथैव भ्रातरं मम॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भद्रे! वामोरु! जब मैं मधुपान के लिए सभा में बैठता हूँ, तब मेरे भाई के समान ही गन्धर्वों सहित अप्सराएँ मेरी सेवा के लिए उपस्थित रहती हैं॥13॥
 
Bhadre! Vaamoru! When I sit in a gathering for drinking Madhu, then just like my brother, Apsaras along with Gandharvas are present to serve me.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)