श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 280: राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.280.65 
तैलाभिषिक्तो विकचो मज्जन् पङ्के दशानन:।
असकृत् खरयुक्ते तु रथे नृत्यन्निव स्थित:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
"मैंने स्वप्न में रावण को तेल से नहाते, सिर मुंडाए और कीचड़ में डूबे देखा। फिर कई बार उसे गधों द्वारा खींचे जा रहे रथ पर खड़े होकर नाचते देखा।"
 
‘In my dreams I saw Ravana bathing in oil, with shaven head and drowning in mud. Then many times I saw him standing on a chariot drawn by donkeys and dancing.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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