श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 280: राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.280.47 
तास्तु तामायतापाङ्गीं पिशाच्यो दारुणस्वरा:।
तर्जयन्ति सदा रौद्रा: परुषव्यञ्जनस्वरा:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
वे राक्षसी स्त्रियाँ देखने में बड़ी भयानक थीं। उनकी वाणी अत्यंत भयंकर थी। उनके मुख से निकलने वाले स्वर और व्यंजन बड़े कर्कश थे। वे राक्षसियाँ बड़ी-बड़ी आँखों से सीता को निम्न बातें कहकर सदैव डाँटती और फटकारती रहती थीं -॥47॥
 
Those demonic women were very terrifying to look at. Their voices were extremely dreadful. The vowels and consonants that came out of their mouths were very harsh. Those demonesses always kept scolding and reprimanding Sita with large eyes by saying the following things -॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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