श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 280: राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.280.4 
न त्वामेवंविधो भाव: स्प्रष्टुमर्हति मानद।
आत्मवन्तमिव व्याधि: पुरुषं वृद्धशीलिनम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे आदरणीय! जिस प्रकार मन को वश में रखने वाले तथा बड़ों के समान अनुशासनपूर्वक रहने वाले पुरुष को कोई रोग छू नहीं सकता, उसी प्रकार आपको भी ऐसी विवशता का छू जाना उचित नहीं जान पड़ता।॥4॥
 
Respected! Just as no disease can touch a man who controls his mind and lives with discipline like the elders, similarly, it does not seem appropriate for you to be touched by such helplessness.'॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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