श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 280: राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.280.27 
असकृत् त्वं मया पूर्वं निर्जितो जीवितप्रिय:।
मुक्तो ज्ञातिरिति ज्ञात्वा का त्वरा मरणे पुन:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अरे! तुम पहले भी कई बार युद्ध में मुझसे पराजित हो चुके हो और प्राणों के लोभ के कारण अपनी जान बचाने के लिए भागते रहे हो। मैंने भी तुम्हें अपना भाई मानकर जीवित छोड़ दिया है। फिर आज तुम मरने के लिए इतने आतुर क्यों हो?'
 
Hey! You have been defeated by me in battle many times before and due to your greed for life, you have kept running away to save your life. I have also left you alive considering you as my brother. Then why are you so eager to die today?'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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