श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 280: राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.280.1 
मार्कण्डेय उवाच
ततोऽविदूरे नलिनीं प्रभूतकमलोत्पलाम्।
सीताहरणदु:खार्त: पम्पां राम: समासदत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तत्पश्चात सीताहरण के दुःख से व्याकुल होकर श्री रामचन्द्रजी पंपासरोवर गए, जो वहाँ से कुछ दूर था। वहाँ बहुत से कमल और कुमुदिनियाँ लिखी हुई थीं॥1॥
 
Markandeyji says- Yudhishthira! Thereafter, being troubled by the grief of Sita's abduction, Shri Ramchandraji went to Pampasarovar, which was a little far from there. There were many lotus and water lilies written in it.॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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